श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 54-55h
 
 
श्लोक  14.90.54-55h 
इत्युक्त: स तया सक्तून् प्रगृह्येदं वचोऽब्रवीत्॥ ५४॥
द्विज सक्तूनिमान् भूय: प्रतिगृह्णीष्व सत्तम।
 
 
अनुवाद
पत्नी के ऐसा कहने पर ब्राह्मण ने सत्तू लेकर अतिथि से कहा - 'हे मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मण! कृपया यह सत्तू पुनः ग्रहण करें।' ॥54 1/2॥
 
On his wife saying this, the Brahmin took the sattu and said to the guest - 'O best of the saints, Brahmin! Please take this sattu again.' ॥ 54 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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