श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 53-54h
 
 
श्लोक  14.90.53-54h 
जरापरिगतो वृद्ध: क्षुधार्तो दुर्बलो भृशम्॥ ५३॥
उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शित:।
 
 
अनुवाद
‘तुम भी जीर्ण, वृद्ध, भूखे, अत्यन्त दुर्बल, उपवास के कारण थके हुए और कृश हो रहे हो। (तब जैसे तुम भूख का दुःख सहन करते हो, वैसे ही मैं भी सहन करूँगा)’॥53 1/2॥
 
‘You too are decrepit, old, hungry, very weak, tired due to fasting and becoming emaciated. (Then just as you bear the pain of hunger, I will also bear it in the same way)’॥ 53 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas