श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  14.90.43 
इति ब्रुवन्तीं तां साध्वीं भार्यां स द्विजसत्तम:।
क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा तान् सक्तून् नाभ्यनन्दत॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
अपनी पतिव्रता पत्नी के ये वचन सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उसे भूखा समझकर उसके द्वारा दिया हुआ आटा ग्रहण करना नहीं चाहा ॥43॥
 
On hearing these words of his faithful wife, that great Brahmin considered her to be hungry and did not wish to take the flour offered by her. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)