श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  14.90.34-35 
अथागच्छद् द्विज: कश्चिदतिथिर्भुञ्जतां तदा॥ ३४॥
ते तं दृष्ट्वातिथिं प्राप्तं प्रहृष्टमनसोऽभवन्।
तेऽभिवाद्य सुखप्रश्नं पृष्ट्वा तमतिथिं तदा॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वह अभी भोजन करने बैठा ही था कि एक ब्राह्मण अतिथि उसके घर आया। अतिथि को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अतिथि का अभिवादन किया और उसका कुशलक्षेम पूछा। 34-35.
 
He had just sat down for food when a Brahmin guest arrived at his place. He was very happy to see the guest. He greeted the guest and asked about his well-being. 34-35.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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