श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  14.90.24 
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे धर्मज्ञैर्बहुभिर्वृते।
उञ्छवृत्तिर्द्विज: कश्चित् कापोतिरभवत् तदा॥ २४॥
 
 
अनुवाद
कुछ दिन पहले की बात है, पवित्र कुरुक्षेत्र भूमि में, जहाँ अनेक धर्मात्मा ऋषि निवास करते हैं, एक ब्राह्मण रहता था। वह सदाचारी जीवन व्यतीत करता था। वह कबूतर की भाँति अन्न के दाने चुनकर लाता और उसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।॥24॥
 
A few days ago, in the holy land of Kurukshetra, where many religious sages reside, there lived a Brahmin. He lived his life in an upright manner. Like a pigeon, he used to pick up grains of food and bring them back and support his family with the same.॥24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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