श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  14.90.2 
वैशम्पायन उवाच
श्रूयतां राजशार्दूल महदाश्चर्यमुत्तमम्।
अश्वमेधे महायज्ञे निवृत्ते यदभूत् प्रभो॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - नृपश्रेष्ठ! प्रभु! जब युधिष्ठिर का वह महान अश्वमेध यज्ञ पूर्ण हुआ, उसी समय एक बहुत ही उत्तम किन्तु अत्यन्त आश्चर्यमय घटना घटी, मैं उसे आपसे कहता हूँ; सुनिए॥2॥
 
Vaishampayanji said – Nripashrestha! Lord! When that great Ashvamedha Yagya of Yudhishthira was completed, at the same time a very good but very surprising incident happened, let me tell you about it; Listen. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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