श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 115-116h
 
 
श्लोक  14.90.115-116h 
सक्तुप्रस्थलवैस्तैर्हि तदाहं काञ्चनीकृत:॥ ११५॥
नहि यज्ञो महानेष सदृशस्तैर्मतो मम।
 
 
अनुवाद
क्योंकि उस समय एक किलो बेसन से गिरे हुए कुछ कणों के प्रभाव से मेरा आधा शरीर स्वर्णमय हो गया था; परंतु यह महान् यज्ञ भी मुझे वैसा नहीं बना सका; अतः मेरी दृष्टि में यह यज्ञ एक किलो बेसन के उन कणों के बराबर भी नहीं है ॥115 1/2॥
 
Because at that time, due to the effect of some particles that had fallen from a kilo of gram flour, half of my body had become golden; but even this great sacrifice could not make me like that; hence, in my opinion, this sacrifice is not even equal to those particles of a kilo of gram flour. ॥ 115 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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