श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 113-114h
 
 
श्लोक  14.90.113-114h 
तपोवनानि यज्ञांश्च हृष्टोऽभ्येमि पुन: पुन:।
यज्ञं त्वहमिमं श्रुत्वा कुरुराजस्य धीमत:॥ ११३॥
आशया परया प्राप्तो न चाहं काञ्चनीकृत:।
 
 
अनुवाद
इसी उद्देश्य से मैं बड़े हर्ष और उत्साह के साथ अनेक आश्रमों और यज्ञ-स्थलों में जाता रहता हूँ। परम बुद्धिमान कुरुराज युधिष्ठिर के यज्ञ का महान कोलाहल सुनकर मैं बड़ी आशा लेकर यहाँ आया हूँ; किन्तु मेरा शरीर यहाँ सो नहीं सका।
 
For this very purpose I keep visiting many ashrams and places of sacrifices with great joy and enthusiasm. On hearing the great noise of the sacrifice of the most intelligent Kuru King Yudhishthira, I came here with great hopes; but my body could not sleep here.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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