श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  14.90.112 
पश्यतेमं सुविपुलं तपसा तस्य धीमत:।
कथमेवंविधं स्याद् वै पार्श्वमन्यदिति द्विजा:॥ ११२॥
 
 
अनुवाद
उस बुद्धिमान ब्राह्मण की तपस्या से मुझे जो महान फल प्राप्त हुआ है, उसे आप सब अपनी आँखों से देख सकते हैं। ब्राह्मणों! अब मुझे यह चिंता हो रही है कि मेरे शरीर का दूसरा भाग भी ऐसा कैसे हो सकता है?॥112॥
 
You all can see with your own eyes the great fruit I have received by the penance of that wise Brahmin. Brahmins! Now I am worried that how can the other side of my body also be like this?॥ 112॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas