श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 109-110
 
 
श्लोक  14.90.109-110 
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च॥ १०९॥
दिव्यपुष्पविमर्दाश्च साधोर्दानलवैश्च तै:।
विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम्॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् सत्तू की सुगन्ध को सूँघने से, वहाँ गिरे हुए जल की कीच के स्पर्श से, वहाँ गिरे हुए दिव्य पुष्पों को पैरों से रौंदने से, उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के दान देने पर गिरे हुए अन्न के कणों पर ध्यान लगाने से तथा उस महाबुद्धिमान ब्राह्मण के तप के प्रभाव से मेरा सिर सोने का हो गया॥109-110॥
 
Thereafter by smelling the fragrance of Sattu, coming in contact with the mud of the water fallen there, trampling the divine flowers fallen there, concentrating on the particles of food fallen when that great Brahmin was giving alms, and by the influence of the austerity of that high-minded Brahmin, my head became of gold.॥109-110॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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