श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 103-104
 
 
श्लोक  14.90.103-104 
न राजसूयैर्बहुभिरिष्ट्वा विपुलदक्षिणै:॥ १०३॥
न चाश्वमेधैर्बहुभि: फलं सममिदं तव।
सक्तुप्रस्थेन विजितो ब्रह्मलोकस्त्वयाक्षय:॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
‘इस दान का जो फल तुम्हें मिला है, वह अनेक राजसूय और अश्वमेध यज्ञों तथा प्रचुर दक्षिणा से भी नहीं मिलता। एक किलो सत्तू दान करके तुमने सनातन ब्रह्मलोक को जीत लिया है।॥103-104॥
 
‘The fruit of this donation which you have received cannot be equalled even by numerous Rajasuya and Ashvamedha sacrifices with abundant dakshina. By donating a kilo of sattu, you have won the eternal Brahmaloka.॥ 103-104॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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