श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 90: युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना  »  श्लोक 101-102h
 
 
श्लोक  14.90.101-102h 
विभवो न नृणां पुण्यं स्वशक्त्या स्वर्जितं सताम्॥ १०१॥
न यज्ञैर्विविधैर्विप्र यथान्यायेन संचितै:।
 
 
अनुवाद
विप्रवर! मनुष्य के लिए पुण्य कमाने का एकमात्र कारण धन नहीं है। पुण्यात्मा व्यक्ति अपनी शक्ति के अनुसार सहज ही पुण्य कमा लेता है। विवेकपूर्वक बचाए गए अन्न के दान से जो पुण्य फल प्राप्त होता है, वह अनेक प्रकार के यज्ञों से भी प्राप्त नहीं हो सकता।॥101 1/2॥
 
Vipravar! Wealth is not the only reason for human beings to earn virtue. A virtuous person easily earns virtue according to his strength. The good result that is obtained by donating food grains saved judiciously cannot be achieved even by performing various types of yagyas.॥ 101 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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