श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 9: बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुन: लौटकर इन्द्रसे ब्रह्मबलकी श्रेष्ठता बताना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  14.9.25-26 
अग्निरुवाच
गन्धर्वराड् यत्वयं तत्र दूतो
बिभेम्यहं वासव तत्र गन्तुम्।
संरब्धो मामब्रवीत् तीक्ष्णरोष:
संवर्तो वाक्यं चरितब्रह्मचर्य:॥ २५॥
यद्यागच्छे: पुनरेवं कथंचिद्
बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते।
दहेयं त्वां चक्षुषा दारुणेन
संक्रुद्ध इत्येतदवैहि शक्र॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अग्नि ने कहा - देवेन्द्र! यह गन्धर्वराज दूत बनकर वहाँ जाए। मैं वहाँ पुनः जाने से डरता हूँ; क्योंकि ब्रह्मचारी संवर्तने ने अत्यन्त क्रोध में मुझसे कहा था - 'अग्ने! यदि तुम इस प्रकार किसी प्रकार बृहस्पति को मरुत्त के पास ले जाने के लिए आओगे, तो मैं क्रोधित होकर अपनी भयंकर दृष्टि से तुम्हें भस्म कर दूँगा।' इन्द्र! तुम उनके वचनों को अच्छी तरह समझ लो ॥25-26॥
 
Agni said – Devendra! This Gandharva king should go there as a messenger. I am afraid to go there again; Because Brahmachari Samvartane had said to me in intense anger, 'Agne! If you somehow come like this to take Brihaspati to Marutta, then I will be angry and will burn you to ashes with my fierce gaze.' Indra! Understand his words well. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)