श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 89: युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  14.89.43-44h 
दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम्।
तं महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम्॥ ४३॥
कथयन्ति स्म पुरुषा नानादेशनिवासिन:।
 
 
अनुवाद
‘जिसकी जो इच्छा हो, उसे वह दिया जाए। सबको उसकी इच्छानुसार भोजन कराया जाए’ - यह घोषणा दिन-रात चलती रही - कभी रुकी नहीं। विभिन्न देशों के लोग बहुत देर तक स्वस्थ लोगों से भरे उस यज्ञोत्सव की चर्चा करते रहे।
 
‘Whoever desires whatever, he should be given that. Everyone should be fed according to their wish’ – this announcement continued day and night – it never stopped. People from various countries kept talking about that yajna festival filled with healthy people for a long time. 43 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)