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mahabharat 14.89.39-40: इस प्रकार बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर का यज्ञ पूर्ण हुआ। उसमें अन्न, धन और रत्नों के ढेर लग गए। देवताओं के मन में अपार इच्छा उत्पन्न करने वाली वस्तुओं का समुद्र उमड़ पड़ा। वहाँ अनेक तालाब थे जिनमें घी की कीच जमा थी और अन्न के पर्वत थे। हे भारतभूषण! रस से परिपूर्ण कीचड़ रहित नदियाँ बह रही थीं। 39-40।   |   mahabharat अध्याय 14.89: युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 89: युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  14.89.39-40 
एवं बभूव यज्ञ: स धर्मराजस्य धीमत:।
बह्वन्नधनरत्नौघ: सुरामैरेयसागर:॥ ३९॥
सर्पि:पङ्का ह्रदा यत्र बभूवुश्चान्नपर्वता:।
रसालाकर्दमा नद्यो बभूवुर्भरतर्षभ॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर का यज्ञ पूर्ण हुआ। उसमें अन्न, धन और रत्नों के ढेर लग गए। देवताओं के मन में अपार इच्छा उत्पन्न करने वाली वस्तुओं का समुद्र उमड़ पड़ा। वहाँ अनेक तालाब थे जिनमें घी की कीच जमा थी और अन्न के पर्वत थे। हे भारतभूषण! रस से परिपूर्ण कीचड़ रहित नदियाँ बह रही थीं। 39-40।
 
Thus the yagya of the wise Dharmaraja Yudhishthira was completed. There were heaps of food, wealth and gems in it. There was a sea of ​​things that created immense desire in the minds of the gods. There were many ponds in which the mud of ghee was deposited and there were mountains of food grains. O Bharatbhushan! Mud-free rivers full of juice flowed. 39-40.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)