श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 88: उलूपी और चित्राङ्गदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण आदिसे सत्कार तथा अश्वमेध-यज्ञका आरम्भ  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  14.88.16 
पवित्रं परमं चैतत् पावनं चैतदुत्तमम्।
यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन॥ १६॥
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! अश्वमेध यज्ञ की भस्म से जो स्नान तुम्हें मिलेगा, वह परम पवित्र, शुद्ध और उत्तम है। 16॥
 
Kurunandan! The bath in the ashes of Ashvamedha Yagya that you will receive is most holy, pure and excellent. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)