श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 80: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्‍गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुन: जीवित होना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  14.80.37 
न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित्।
नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दित:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
"पिता को मारने से मेरा उद्धार नहीं हो सकता। मैं अपने गुरु (पिता) की हत्या के पाप से पीड़ित होकर अवश्य ही नरक में जाऊँगा।" ॥37॥
 
"There is no way for me to be saved by killing my father. I will surely go to hell, afflicted by the sin of killing my Guru (father)." ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)