श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 78: अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दु:शलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति  »  श्लोक 5-7
 
 
श्लोक  14.78.5-7 
तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं शमयितास्मि व:।
एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद् गाण्डीवभृत् तदा॥ ५॥
ततोऽथ वचनं स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत।
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषव:॥ ६॥
जेतव्याश्चेति यत् प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना।
चिन्तयामास स तदा फाल्गुन: पुरुषर्षभ:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
युद्ध का साहस हृदय में रखकर खड़े हो जाओ। मैं तुम्हारा अभिमान चूर-चूर कर दूँगा।’ भारत! शत्रुओं से ऐसे वचन कहकर कुरुपुत्र गाण्डीवधारी अर्जुन को अपने बड़े भाई के वचन याद आने लगे। महाबली धर्मराज ने कहा था, ‘पुत्र! युद्धभूमि में विजय चाहने वाले क्षत्रियों को मत मारो। साथ ही उन्हें परास्त भी करो।’ यह स्मरण करके महापुरुष अर्जुन इस प्रकार चिंता करने लगे।
 
Stand with the courage of war in your heart. I will shatter your pride.' Bhaarat! After saying such words to the enemies, Arjuna, the son of Kuru, wielding the Gandiva, started remembering the words of his elder brother. The great Dharmaraj had said, 'Son! Do not kill the Kshatriyas who wish to win in the battlefield. At the same time, defeat them as well.' Remembering this, Arjuna, the great man, started worrying in this manner. 5-7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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