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श्री महाभारत
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पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
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अध्याय 78: अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दु:शलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति
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श्लोक 48
श्लोक
14.78.48
स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान् देशान् यथाक्रमम्।
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन्॥ ४८॥
अनुवाद
वह घोड़ा धीरे-धीरे सम्पूर्ण देशों में यथोचित गति से घूमता हुआ अपनी इच्छानुसार विचरण करने लगा और अर्जुन का पराक्रम बढ़ाने लगा ॥48॥
That horse gradually roamed all the countries at a sufficient speed and began to move about as per its wish, enhancing the prowess of Arjuna. ॥ 48॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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