श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 78: अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दु:शलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  14.78.32 
तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो।
गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! उसे ऐसी अवस्था में पड़ा हुआ देखकर, मैं उसके पुत्र को साथ लेकर आज आपकी शरण में आया हूँ। ॥32॥
 
Prabhu! Seeing him lying in such a state, I have come to you today seeking refuge, taking his son with me.' ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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