श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 67: परीक्षित् को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  14.67.2 
पुण्डरीकाक्ष पश्य त्वं पौत्रं पार्थस्य धीमत:।
परिक्षीणेषु कुरुषु परिक्षीणं गतायुषम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
भैया कमलनयन! अपने बुद्धिमान मित्र पार्थ के इस पौत्र की दशा तो देखो। इसका जन्म कौरवों के नाश के बाद हुआ था; किन्तु यह भी दीर्घायु होकर मर गया॥ 2॥
 
Brother Kamalnayan! Just look at the condition of this grandson of your wise friend Parth. He was born after the destruction of the Kauravas; but he too died after living a long life.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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