श्लोक 1-3: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! जब महाबली वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण अपने पिता को महाभारत युद्ध का वृत्तांत सुना रहे थे, तब उन्होंने जान-बूझकर अभिमन्यु वध का वृत्तांत बीच में ही छोड़ दिया। परम बुद्धिमान और वीर श्रीकृष्ण ने सोचा कि कहीं मेरे पिता अपने पौत्र की मृत्यु का अशुभ समाचार सुनकर शोक से व्याकुल न हो जाएँ। वे व्याकुल हो जाएँ। इसीलिए उन्होंने वह वृत्तांत नहीं सुनाया। 1-3।
श्लोक 4: परन्तु जब सुभद्रा ने देखा कि उसने अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार उसे नहीं सुनाया, तो उसने उसे स्मरण दिलाया और कहा, ‘भैया! कृपया मुझे अभिमन्यु के वध का समाचार भी बताओ।’ यह कहकर वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 5: वसुदेव ने अपनी पुत्री सुभद्रा को भूमि पर लेटा हुआ देखा, उसे देखते ही वे भी शोक से मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े॥5॥
श्लोक 6: महाराज! तत्पश्चात दौहित्रव के वध के शोक और शोक से आहत हुए वसुदेवजी ने श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा-॥6॥
श्लोक 7-8: पुत्र कमलनयन! तुम इस पृथ्वी पर सत्यवादी के रूप में विख्यात हो। शत्रुसूदन! फिर आज तुम मुझे मेरे पौत्र की मृत्यु का समाचार क्यों नहीं सुना रहे हो? प्रभु! कृपया मुझे अपने भतीजे की हत्या का यथार्थ वृत्तांत बताओ।'
श्लोक 9-10h: वृष्णिनन्दन! अभिमन्यु के नेत्र आपके समान ही सुन्दर थे। हाय! युद्धभूमि में शत्रुओं ने उसे कैसे मार डाला? ऐसा प्रतीत होता है कि समय पूरा होने से पहले मनुष्य का मरना अत्यन्त कठिन है, इसीलिए यह दुःखद समाचार सुनकर भी मेरा हृदय शोक से सैकड़ों टुकड़ों में नहीं टूट रहा है॥9 1/2॥
श्लोक 10-12h: पुण्डरीकाक्ष! युद्ध में अभिमन्यु ने तुम्हें और अपनी माता सुभद्रा को क्या संदेश दिया था? मेरे प्रिय पौत्र ने, जिसके नेत्र चंचल थे, मरने से पहले मुझे क्या संदेश दिया था? क्या युद्ध में पीठ फेरने पर शत्रुओं ने उसे मार डाला था? गोविन्द! क्या युद्ध में भय के मारे उसने अपना मुख विकृत कर लिया था?॥10-11॥
श्लोक 12-13h: श्री कृष्ण! वह अत्यंत तेजस्वी और प्रभावशाली बालक अपने बाल स्वभाव के कारण मेरे सामने विनम्रतापूर्वक अपनी वीरता का बखान करता था।
श्लोक 13-15h: मेरी पुत्री का प्रिय पुत्र अभिमन्यु युद्धभूमि में द्रोणाचार्य, भीष्म तथा सबसे बलवान कर्ण के साथ युद्ध करने का साहस रखता था। क्या ऐसा हो सकता है कि द्रोण, कर्ण और कृपाचार्य ने मिलकर उस बालक को छलपूर्वक मार डाला हो और इस प्रकार छल से मारा जाकर वह भूमि पर सो रहा हो? केशव! यह सब मुझे बताओ॥13-14 1/2॥
श्लोक 15-16h: अपने पिता को अत्यन्त दुःखी और विलाप करते देख श्रीकृष्ण स्वयं भी अत्यन्त दुःखी हुए और उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले-॥15 1/2॥
श्लोक 16-17h: पिता जी! अभिमन्यु ने युद्ध में आगे रहकर शत्रुओं का सामना किया। उसने कभी अपना मुख नहीं मोड़ा। उस कठिन युद्ध में उसने कभी पीठ नहीं दिखाई। 16 1/2।
श्लोक 17-18h: लाखों राजाओं के समूहों का वध करके तथा द्रोण और कर्ण के साथ युद्ध करके वह बहुत थक गया और दु:शासन के पुत्र के द्वारा मारा गया। 17 1/2
श्लोक 18-19h: "प्रभु! यदि उसे प्रत्येक योद्धा से निरन्तर युद्ध करना पड़ता, तो वज्रधारी इन्द्र भी उसे युद्धभूमि में नहीं मार पाते (किन्तु वहाँ तो स्थिति ही दूसरी थी)।॥18 1/2॥
श्लोक 19-20h: अर्जुन संशप्तकों के साथ युद्ध करते हुए युद्धभूमि से बहुत दूर चले गए थे। इस अवसर का लाभ उठाकर क्रोध में भरे हुए द्रोणाचार्य आदि अनेक वीर योद्धाओं ने उस बालक को चारों ओर से घेर लिया।॥19 1/2॥
श्लोक 20-21h: हे वृष्णिवंश के रत्न पिताश्री! फिर भी आपका पौत्र बहुत से शत्रुओं का संहार करके युद्ध में दु:शासन के पुत्र का विषय बन गया।
श्लोक 21-22h: महामते! अभिमन्यु अवश्य ही स्वर्ग को गया है; अतः उसके लिए शोक मत करो। शुद्ध बुद्धि वाले मुनिगण संकट में पड़ने पर भी इतने व्याकुल नहीं होते। 21 1/2॥
श्लोक 22-23h: जिसने द्रोण, कर्ण आदि इन्द्र के समान पराक्रमी योद्धाओं का वीरतापूर्वक सामना किया है, वह स्वर्ग कैसे नहीं प्राप्त कर सकता?॥ 22 1/2॥
श्लोक 23-24h: हे पितामह! इसलिए शोक त्याग दो! शोक के वशीभूत मत होओ। शत्रुओं के नगर को जीतने वाला वीर अभिमन्यु शस्त्रों के प्रहार से पवित्र हो गया और उत्तम गति को प्राप्त हुआ। 23 1/2॥
श्लोक 24-26h: उस वीर के मारे जाने पर मेरी बहिन सुभद्रा शोक से विह्वल होकर अपने पुत्र के पास जाकर कुररी के समान विलाप करने लगी। वह द्रौपदी के पास गई और शोकग्रस्त होकर पूछा, 'आर्य! सब बालक कहाँ हैं? मैं उन सबको देखना चाहती हूँ।'॥24-25 1/2॥
श्लोक 26-27: यह सुनकर कुरुवंश की समस्त स्त्रियाँ उसे दोनों हाथों में पकड़कर अत्यंत व्याकुल हो गईं और करुण स्वर में विलाप करने लगीं।
श्लोक 28: सुभद्रा ने उत्तरा से भी पूछा - "भद्रे! तुम्हारा पति अभिमन्यु कहाँ गया है? तुम उसे शीघ्र ही मेरे आगमन की सूचना दो।"
श्लोक 29: विराटकुमारी! तुम्हारे पति आज मेरे पास क्यों नहीं आ रहे हैं, जो हमेशा मेरी आवाज़ सुनते ही जल्दी से घर से निकल जाते थे?
श्लोक 30: अभिमन्यो! तुम्हारे सभी पराक्रमी चाचा सुरक्षित हैं और युद्ध की इच्छा से यहाँ आये हैं तथा तुम्हारा कुशलक्षेम पूछा है।
श्लोक 31: शत्रुदमन! पहले की भाँति आज भी मुझे युद्ध का हाल बताओ। यद्यपि मैं इस प्रकार विलाप कर रहा हूँ, फिर भी तुम आज यहाँ मुझसे क्यों नहीं बोल रहे हो?॥31॥
श्लोक 32-33: सुभद्रा का इस प्रकार विलाप सुनकर दुःख से विह्वल बुआ कुन्ती ने धीरे-धीरे उसे सान्त्वना देने का प्रयत्न किया और कहा - 'सुभद्रे! वसुदेव, सात्यकि और पिता अर्जुन ने जिस बालक अभिमन्यु को लाड़-प्यार से पाला था, वह काल के नियम से मारा गया है (उसकी आयु पूरी हो गई है, अतः वह मृत्यु के अधीन हो गया है)।॥ 32-33॥
श्लोक 34: यदुनन्दि! मृत्युलोक में उत्पन्न हुए मनुष्यों का यही कर्तव्य है - एक-न-एक दिन उन्हें मृत्यु को प्राप्त होना ही है, अतः तुम शोक मत करो। तुम्हारा दुर्जय पुत्र परम मोक्ष को प्राप्त हो गया है॥ 34॥
श्लोक 35: "पुत्री! हे कमल के समान नेत्रों वाली! तुम महान क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न हुई हो; अतः तुम अपने पुत्र के लिए व्याकुल नेत्रों से शोक न करो।
श्लोक 36: "शुभकामनाएँ! आपकी बहू उत्तरा गर्भवती है, उसकी ओर देखो, शोक मत करो। वह भाभी उत्तरा शीघ्र ही अभिमन्यु के पुत्र को जन्म देगी।"
श्लोक 37: ‘यदुकुलभूषण पितामह! इस प्रकार सुभद्रा को समझाकर और अपना शोक त्यागकर कुन्तिनी ने उसके श्राद्ध की तैयारी की ॥37॥
श्लोक 38: ‘धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर और भीमसेन को आज्ञा देकर तथा यम के समान पराक्रमी नकुल और सहदेव को भी आज्ञा देकर कुन्तीदेवी ने अभिमन्यु के लिए अनेक प्रकार के दान करवाये।
श्लोक 39: यदुकुलभूषण! तत्पश्चात कुन्ती ने ब्राह्मणों को बहुत सी गौएँ दान करके विराटकुमारी उत्तरा से कहा-॥39॥
श्लोक 40: हे विराट की राजकुमारी, अद्वितीय गुणों वाली! अब तुम्हें यहाँ अपने पति के लिए शोक नहीं करना चाहिए। सुंदरी! अपने गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र की रक्षा करो।'
श्लोक 41: महाद्युते! ऐसा कहकर कुन्तीदेवी चुप हो गईं। उन्हीं की आज्ञा से मैं इस सुभद्रादेवी को अपने साथ ले आया हूँ॥ 41॥
श्लोक 42: हे पूज्यवर! आपके पौत्र अभिमन्यु की इसी प्रकार मृत्यु हुई है। हे वीर! आप शोक का त्याग कर दीजिए और अपने मन को शोक से मत भरिए।॥42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥