श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 6: नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  14.6.15 
मरुत्त उवाच
गतोऽस्म्यङ्गिरस: पुत्रं देवाचार्यं बृहस्पतिम्।
यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत॥ १५॥
 
 
अनुवाद
मरुत्त बोले- नारद जी! मैं देवताओं के गुरु और अंगिरा के पुत्र बृहस्पति के पास गया था। मेरा उद्देश्य उनसे अपने यज्ञ के लिए पुरोहित के रूप में मिलना था; किन्तु उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की।
 
Marutta said- Narada ji! I had gone to Brihaspati, the guru of gods and son of Angira. The purpose of my visit was to see him as a priest to perform my yagya; but he did not accept my request. 15.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)