Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.58.6: मैं सदैव ब्राह्मणों को प्रणाम करता था, किन्तु ब्राह्मण के शाप के कारण मुझे यह पाप और यह दयनीय स्थिति प्राप्त हुई है। मैं यहाँ मदयन्ती के साथ रहता हूँ, इस दुःख से छुटकारा पाने का मुझे कोई उपाय नहीं दिखाई देता ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  14.58.6 
सोऽहं द्विजेभ्य: प्रणतो विप्राद् दोषमवाप्तवान्।
गतिमन्यां न पश्यामि मदयन्तीसहायवान्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मैं सदैव ब्राह्मणों को प्रणाम करता था, किन्तु ब्राह्मण के शाप के कारण मुझे यह पाप और यह दयनीय स्थिति प्राप्त हुई है। मैं यहाँ मदयन्ती के साथ रहता हूँ, इस दुःख से छुटकारा पाने का मुझे कोई उपाय नहीं दिखाई देता ॥6॥
 
I always used to bow before the brahmins, but due to the curse of a brahmin I have got this sin and this miserable condition. I live here with Madayanti, I cannot see any way to get rid of this misery. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)