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mahabharat 14.58.50: महाराज भरतनन्दन! उस बढ़ते हुए महान् धूम्र से आवृत नागलोक में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  14.58.50 
तेन धूमेन महता वर्धमानेन भारत।
नागलोके महाराज न प्राज्ञायत किंचन॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
महाराज भरतनन्दन! उस बढ़ते हुए महान् धूम्र से आवृत नागलोक में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था ॥50॥
 
Maharaja Bharatanandan! Nothing could be seen in the Nagaloka which was covered by the great smoke that was increasing. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)