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mahabharat 14.58.49: हे भारत! उत्तंक के फूंकते ही उस अश्वरूपी अग्नि के प्रत्येक रोम से घना धुआँ उठने लगा; जो नागलोक को भयभीत करने वाला था।   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  14.58.49 
ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो धम्यतस्तत्र भारत।
घन: प्रादुरभूद् धूमो नागलोकभयावह:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! उत्तंक के फूंकते ही उस अश्वरूपी अग्नि के प्रत्येक रोम से घना धुआँ उठने लगा; जो नागलोक को भयभीत करने वाला था।
 
Bhaarat! The moment Uttanka started blowing, thick smoke started rising from every pore of that horse-shaped Agni; which was frightening to the Nagaloka.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)