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mahabharat 14.58.44: "बेटा! इस कार्य को किसी भी प्रकार तुच्छ न समझो, क्योंकि गौतम के आश्रम में रहते हुए तुमने अनेक बार ऐसा किया है।" ॥44॥   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  14.58.44 
मा जुगुप्सां कृथा: पुत्र त्वमत्रार्थे कथंचन।
त्वयैतद्धि समाचीर्णं गौतमस्याश्रमे तदा॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
"बेटा! इस कार्य को किसी भी प्रकार तुच्छ न समझो, क्योंकि गौतम के आश्रम में रहते हुए तुमने अनेक बार ऐसा किया है।" ॥44॥
 
"Son, do not despise this act in any way, because you have done this many times while staying at Gautama's hermitage." ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)