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श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  14.58.37 
स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह।
ददर्श नागलोकं च योजनानि सहस्रश:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
उसी मार्ग से वे नागलोक में प्रविष्ट हुए और देखा कि नागों का लोक हजारों योजन तक फैला हुआ है।37.
 
By the same route he entered the Nagaloka and saw that the world of the snakes was spread over thousands of yojanas. 37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)