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mahabharat 14.58.32-33: वैशम्पायन कहते हैं, "हे राजन! इन्द्र उत्तंक के दुःख से दुःखी हो गये। अतः उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण किया और उनसे कहा, 'ब्राह्मण! यह कार्य आपकी क्षमता से परे है। नागलोक यहाँ से हजारों योजन दूर है। इस लकड़ी से वहाँ तक मार्ग बनाना सम्भव नहीं प्रतीत होता।'   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  14.58.32-33 
वैशम्पायन उवाच
स तु तं ब्राह्मणो भूत्वा तस्य दु:खेन दु:खित:।
उत्तङ्कमब्रवीत् वाक्यं नैतच्छक्यं त्वयेति वै॥ ३२॥
इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रश:।
न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, "हे राजन! इन्द्र उत्तंक के दुःख से दुःखी हो गये। अतः उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण किया और उनसे कहा, 'ब्राह्मण! यह कार्य आपकी क्षमता से परे है। नागलोक यहाँ से हजारों योजन दूर है। इस लकड़ी से वहाँ तक मार्ग बनाना सम्भव नहीं प्रतीत होता।'
 
Vaishampayana says, "O King! Indra was saddened by Uttanka's suffering. So he took the guise of a Brahmin and said to him, 'Brahmin! This task is beyond your capability. Nagaloka is thousands of yojanas away from here. It does not seem possible to make a path to it with this wooden stick.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)