Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.58.26-27: जब मुनि उत्तंक ने सर्प को अपने कुंडल चुराते देखा, तो वे क्रोधित हो उठे और अत्यंत क्रोधित होकर वृक्ष से कूद पड़े। वे वापस आए और हाथ में एक लकड़ी लेकर उससे गड्ढा खोदने लगे। | mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ह्रियमाणे तु दृष्ट्वा स कुण्डले भुजगेन ह॥ २६॥
पपात वृक्षात् सोद्वेगो दु:खात् परमकोपन:।
स दण्डकाष्ठमादाय वल्मीकमखनत् तदा॥ २७॥
अनुवाद
जब मुनि उत्तंक ने सर्प को अपने कुंडल चुराते देखा, तो वे क्रोधित हो उठे और अत्यंत क्रोधित होकर वृक्ष से कूद पड़े। वे वापस आए और हाथ में एक लकड़ी लेकर उससे गड्ढा खोदने लगे।
When the sage Uttanka saw the snake stealing his earrings, he became agitated and in great anger jumped from the tree. He came back and took a wooden stick in his hand and started digging the hole with it.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥