श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 57: उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  14.57.25 
स्यन्देते हि दिवा रुक्मं रात्रौ च द्विजसत्तम।
नक्तं नक्षत्रताराणां प्रभामाक्षिप्य वर्तत:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! ये दोनों कुण्डल दिन-रात सोना टपकाते रहते हैं। इतना ही नहीं, रात्रि में ये नक्षत्रों और तारों की चमक भी छीन लेते हैं॥ 25॥
 
‘O best of Brahmins! These two earrings keep on dripping gold day and night. Not only this, at night they also snatch away the radiance of the constellations and stars.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)