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mahabharat 14.57.22: मेरे ये दोनों रत्नमय कुण्डल दिव्य हैं। देवता, यक्ष और महर्षि नाना प्रकार से इन्हें चुराने की इच्छा रखते हैं और सदैव इनके लिए मार्ग खोजते रहते हैं॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 14.57: उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.57.22 
इमे हि दिव्ये मणिकुण्डले मे
देवाश्च यक्षाश्च महर्षयश्च।
तैस्तैरुपायैरपहर्तुकामा-
श्छिद्रेषु नित्यं परितर्कयन्ति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
मेरे ये दोनों रत्नमय कुण्डल दिव्य हैं। देवता, यक्ष और महर्षि नाना प्रकार से इन्हें चुराने की इच्छा रखते हैं और सदैव इनके लिए मार्ग खोजते रहते हैं॥ 22॥
 
These two precious stone earrings of mine are divine. The gods, the Yaksh and the great sages wish to steal them by various means and are always looking for loopholes for them.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)