श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 57: उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  14.57.10 
सत्यं ते प्रतिजानामि नात्र मिथ्या कथंचन।
अनृतं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं तुमसे सत्य वचन कहता हूँ, इसमें झूठ के लिए कोई स्थान नहीं है। मैंने पहले कभी हँसी-मजाक में भी झूठ नहीं बोला, फिर अन्य अवसरों पर कैसे झूठ बोल सकता हूँ?॥ 10॥
 
I promise you the truth, there is no room for any falsehood in this. I have never lied even in jest before, so how can I lie on other occasions?॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)