श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  14.56.26 
य द् दुर्लभं हि लोकेऽस्मिन् रत्नमत्यद्भुतं महत्।
तदानयेयं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशय:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में जो भी सबसे दुर्लभ, अद्भुत और महान रत्न है, उसे भी मैं तप के बल से ला सकता हूँ; इसमें कोई संदेह नहीं है।॥26॥
 
Whatever is the most rare, wonderful and great gem in this world, I can bring it also by the power of penance; there is no doubt in this.'॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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