vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना
»
श्लोक 25
श्लोक
14.56.25
कं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थं विनियुङ्क्ष्व माम्।
प्रियं हितं च काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि॥ २५॥
अनुवाद
माता! आज्ञा दीजिए, मैं आपको गुरुदक्षिणा में क्या दूँ? मैं अपना धन और प्राण देकर भी आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ और आपका कल्याण करना चाहता हूँ॥ 25॥
‘Mother! Please order me, what should I give you as Gurudakshina? I want to please you and do good to you even by sacrificing my wealth and life.॥ 25॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas