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mahabharat 14.56.17: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे बाद सैकड़ों-हजारों शिष्य आपकी सेवा में आए और विद्याध्ययन पूरा करके आपकी आज्ञा लेकर चले गए (केवल मैं यहाँ लेटा हुआ हूँ)।॥17॥   |   mahabharat अध्याय 14.56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  14.56.17 
भवता त्वभ्यनुज्ञाता: शिष्या: प्रत्यवरा मम।
उपपन्ना द्विजश्रेष्ठ शतशोऽथ सहस्रश:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे बाद सैकड़ों-हजारों शिष्य आपकी सेवा में आए और विद्याध्ययन पूरा करके आपकी आज्ञा लेकर चले गए (केवल मैं यहाँ लेटा हुआ हूँ)।॥17॥
 
O best of Brahmins! After me, hundreds and thousands of disciples came to your service and after completing their studies, they took your permission and went away (only I am lying here).॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)