श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  14.56.15-16 
उत्तङ्क उवाच
भवद्‍गतेन मनसा भवत्प्रियचिकीर्षया।
भवद्भक्तिगतेनेह भवद्भावानुगेन च॥ १५॥
जरेयं नावबुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे।
शतवर्षोषितं मां हि न त्वमभ्यनुजानिथा:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने कहा, "गुरुदेव! मेरा मन सदैव आपमें ही लगा रहा है। आपको प्रसन्न करने की इच्छा से मैं सदैव आपकी सेवा में लगा रहा हूँ। मेरी पूर्ण भक्ति आपके प्रति रही है और आपके प्रति समर्पित होने के कारण मुझे न तो सांसारिक सुखों का अनुभव हुआ है और न ही मुझे इस बात का आभास हुआ है कि मैं वृद्ध हो रहा हूँ। मैंने यहाँ सौ वर्ष बिताये हैं, फिर भी आपने मुझे घर जाने की अनुमति नहीं दी।"
 
Uttanka said, "Gurudev! My mind has always been focused on you. With the desire to please you, I have always been engaged in your service. My complete devotion has been towards you and being devoted to you, I have neither experienced worldly pleasures nor have I realized that I am getting old. I have spent a hundred years here, yet you have not given me permission to go home."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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