श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 54: भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  14.54.21-22 
भयं च महदुद्दिश्य त्रासिता: कुरवो मया।
क्रुद्धेन भूत्वा तु पुनर्यथावदनुदर्शिता:॥ २१॥
तेऽधर्मेणेह संयुक्ता: परीता: कालधर्मणा।
धर्मेण निहता युद्धे गता: स्वर्गं न संशय:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद क्रोध में भरकर मैंने कौरवों को अनेक प्रकार के भय दिखाकर बहुत डराया और युद्ध का भावी परिणाम प्रत्यक्ष रूप से बताया; किन्तु वे अधर्म से युक्त और काल के वश में थे। इसलिए वे मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हुए। तब क्षत्रिय धर्म के अनुसार वे युद्ध में मारे गए। इसमें संदेह नहीं कि वे सब स्वर्गलोक को चले गए। 21-22।
 
After this, being filled with anger, I showed the Kauravas many fears and intimidated them a lot and showed them the future result of the war in a real way; but they were full of irreligion and were affected by time. Therefore, they did not agree to listen to me. Then, according to the Kshatriya Dharma, they were killed in the war. There is no doubt that all of them have gone to heaven. 21-22.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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