श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 54: भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  14.54.14-15h 
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्यय:॥ १४॥
भूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च।
 
 
अनुवाद
मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ और मैं ही इन्द्र हूँ। मैं ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का कारण हूँ। समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश भी मुझसे ही होता है। ॥14 1/2॥
 
I am Vishnu, I am Brahma and I am Indra. I am the cause of the birth and destruction of all living beings. The creation and destruction of all living beings also take place through me. ॥14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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