श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 54: भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना  »  श्लोक 12-14h
 
 
श्लोक  14.54.12-14h 
तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवै:॥ १२॥
बह्वी: संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम।
धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च॥ १३॥
तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव।
 
 
अनुवाद
भार्गव! मैं उन पुरुषों के साथ सदैव निवास करता हूँ जो उस धर्म में तत्पर होकर पापकर्मों से विरत रहते हैं। हे महामुनि! धर्म की रक्षा और स्थापना के लिए मैं तीनों लोकों में अनेक योनियों में अवतार लेता हूँ और उन रूपों और वेशों में तदनुसार आचरण करता हूँ। ॥12-13 1/2॥
 
Bhaargava! I always reside with those men who have abstained from sinful acts by being devoted to that religion. O great saint! For the protection and establishment of religion, I take incarnation in many species in the three worlds and behave accordingly in those forms and attires. ॥12-13 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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