श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 51: तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  14.51.32 
तस्मात् कर्मसु नि:स्नेहा ये केचित् पारदर्शिन:।
विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममय: स्मृत:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अतः जो शुद्ध विद्वान् हैं, वे कर्मों में आसक्त नहीं होते; क्योंकि यह पुरुष (आत्मा) ज्ञान से युक्त है, कर्म से युक्त नहीं है ॥32॥
 
Therefore, those who are transparent scholars are not attached to actions; Because this man (soul) is full of knowledge, not full of action. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)