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mahabharat 14.50.6: जो विद्वान पुरुष समता में स्थित हैं, जो श्रद्धापूर्वक अपने कर्म करते हैं और फल में आसक्त नहीं होते, वे धैर्यवान और उत्तम दृष्टि वाले माने जाते हैं ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  14.50.6 
कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चित:।
अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीरा: साधुदर्शिन:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो विद्वान पुरुष समता में स्थित हैं, जो श्रद्धापूर्वक अपने कर्म करते हैं और फल में आसक्त नहीं होते, वे धैर्यवान और उत्तम दृष्टि वाले माने जाते हैं ॥6॥
 
Those learned persons who are situated in equanimity and who perform their duties with faith and are not attached to their results are considered to be patient and of excellent vision. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)