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mahabharat 14.50.52h: आकाश शब्द को एक ही गुण माना गया है। उस शब्द के अनेक गुण हैं। मैं उनका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा। 51 1/2।   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 52h
 
 
श्लोक  14.50.52h 
तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव च स्मृत:।
 
 
अनुवाद
आकाश शब्द को एक ही गुण माना गया है। उस शब्द के अनेक गुण हैं। मैं उनका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा। 51 1/2।
 
The word of the sky is considered to be just one quality. That word has many qualities. I will describe them in detail. 51 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)