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mahabharat 14.50.40: विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवीं गंध - ये पृथ्वी के पाँच गुण हैं जिन्हें जानना चाहिए ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  14.50.40 
शब्द: स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चम:।
एते पञ्च गुणा भूमेर्विज्ञेया द्विजसत्तमा:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवीं गंध - ये पृथ्वी के पाँच गुण हैं जिन्हें जानना चाहिए ॥40॥
 
Vipravaro! Sound, touch, form, taste and the fifth smell – these are the five qualities of the earth that should be known. 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)