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mahabharat 14.50.35: अव्यक्त प्रकृति कारण और कार्य दोनों है। इसी प्रकार महातत्त्व के कारण और कार्य दोनों सुने गए हैं ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  14.50.35 
बीजधर्मं तथाव्यक्तं प्रसवात्मकमेव च।
बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति न: श्रुतम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
अव्यक्त प्रकृति कारण और कार्य दोनों है। इसी प्रकार महातत्त्व के कारण और कार्य दोनों सुने गए हैं ॥35॥
 
The unmanifested nature is both causal and actional. Similarly, both the cause and effect of Mahatattva have been heard. 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)