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mahabharat 14.50.32: जो गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द से संबंधित नहीं है तथा जिसका ऋषिगण बुद्धि से चिंतन करते हैं, उसे 'प्रधान' कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  14.50.32 
यन्नैव गन्धिनो रस्यं न रूपस्पर्शशब्दवत्।
मन्यन्ते मुनयो बुद्धॺा तत् प्रधानं प्रचक्षते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जो गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द से संबंधित नहीं है तथा जिसका ऋषिगण बुद्धि से चिंतन करते हैं, उसे 'प्रधान' कहते हैं।
 
That which is not associated with smell, taste, form, touch and sound, and which the sages contemplate with their intellect, is called 'Pradhan'. 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)