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mahabharat 14.50.23-24: देखो, रथ से यात्रा करने वाला मूर्ख मनुष्य भी ऊँचे पर्वत पर पहुँचकर कष्ट पाता है, परन्तु बुद्धिमान मनुष्य रथ से उतनी ही दूर तक यात्रा करता है, जितनी दूर तक रथ जा सकता है और जब रथ का मार्ग समाप्त हो जाता है, तब उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता है ॥23-24॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  14.50.23-24 
रथेन रथिनं पश्य क्लिश्यमानमचेतनम्॥ २३॥
यावद् रथपथस्तावद् रथेन स तु गच्छति।
क्षीणे रथपदे विद्वान् रथमुत्सृज्य गच्छति॥ २४॥
 
 
अनुवाद
देखो, रथ से यात्रा करने वाला मूर्ख मनुष्य भी ऊँचे पर्वत पर पहुँचकर कष्ट पाता है, परन्तु बुद्धिमान मनुष्य रथ से उतनी ही दूर तक यात्रा करता है, जितनी दूर तक रथ जा सकता है और जब रथ का मार्ग समाप्त हो जाता है, तब उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता है ॥23-24॥
 
See, even a foolish man traveling by chariot faces troubles on reaching a high mountain, but an intelligent man travels by chariot as far as the chariot can go and when the chariot's path ends, he abandons it and travels on foot. ॥23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)