अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन
श्लोक 1: ब्रह्माजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं तुम्हारे द्वारा पूछे गए विषय को बताता हूँ। योग्य शिष्य पाकर गुरु जो उपदेश दें, उसे सुनो।
श्लोक 2-3h: इस विषय को पूरा सुनो और इसे अच्छी तरह आत्मसात करो। ऐसा माना जाता है कि सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है। यह साधन चिंता से मुक्त, सर्वोत्तम और धर्म को लक्ष्य करने वाला है॥ 2 1/2॥
श्लोक 3-4h: सत्य का अनुभव करने वाले वृद्ध लोग कहते हैं कि ‘ज्ञान ही परम कल्याण का एकमात्र साधन है।’ अतः केवल परम शुद्ध ज्ञान के द्वारा ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो सकता है।
श्लोक 4: जो प्राणी हिंसा करते हैं, नास्तिक वृत्ति अपनाते हैं, तथा लोभ और मोह में फँसे रहते हैं, उन्हें नरक में गिरना पड़ता है ॥4॥
श्लोक 5: जो लोग सावधानी से शुभ कर्म करते हैं, वे इस संसार में बार-बार जन्म लेते हैं और सुखी होते हैं ॥5॥
श्लोक 6: जो विद्वान पुरुष समता में स्थित हैं, जो श्रद्धापूर्वक अपने कर्म करते हैं और फल में आसक्त नहीं होते, वे धैर्यवान और उत्तम दृष्टि वाले माने जाते हैं ॥6॥
श्लोक 7: हे श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि सत्त्व और क्षेत्रज्ञ का संयोग और वियोग किस प्रकार होता है। इस विषय को ध्यानपूर्वक सुनो। ॥7॥
श्लोक 8: इन दोनों में ही यहाँ विषय-विषय सम्बन्ध का विचार किया गया है। इनमें पुरुष को सदैव विषय माना गया है और सत्त्व को विषय माना गया है।8॥
श्लोक 9: पिछले अध्याय में मच्छर और गूलर के उदाहरण से यह बताया गया है कि भोगनेवाला अचेतन जीव सनातन क्षेत्रज्ञ को नहीं जानता, किन्तु जो क्षेत्रज्ञ है, वह जानता है कि भोगनेवाला आत्मा है और भोगनेवाला जीव ही जीव है।॥9॥
श्लोक 10: ज्ञानी पुरुष कहता है कि सत्त्व द्वैत है और क्षेत्रज्ञ कहता है कि वह द्वंद्वरहित, शुद्ध, नित्य और निर्गुण है ॥10॥
श्लोक 11: वह विद्वान सर्वत्र स्थित ज्ञान का समभाव से पालन करता है। जैसे कमल का पत्ता अनासक्त रहते हुए भी जल को धारण करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष सदैव सत्त्व का सेवन करता है। 11॥
श्लोक 12-13h: जैसे कमल के पत्ते पर पड़ी हुई जल की चंचल बूँद भी उसे गीला नहीं कर सकती, वैसे ही विद्वान् पुरुष भी समस्त गुणों से संबंधित होते हुए भी उनमें से किसी में भी आसक्त नहीं होता। अतः क्षेत्रज्ञ पुरुष ही वास्तव में विरक्त है, इसमें संशय नहीं है। ॥12 1/2॥
श्लोक 13-14h: यह निश्चित है कि मनुष्य जिन भौतिक पदार्थों का भोग कर सकता है, वे सभी सत्व कहलाते हैं और जैसे पदार्थ और विषय में सम्बन्ध है, वैसे ही इन दोनों में भी सम्बन्ध है। ॥13 1/2॥
श्लोक 14: जैसे मनुष्य हाथ में दीपक लेकर अंधकार में चलता है, वैसे ही परम तत्व का साधक सत्य के दीपक के प्रकाश में साधना के मार्ग पर चलता है ॥14॥
श्लोक 15: जब तक दीपक में द्रव्य और गुण रहते हैं, तब तक वह प्रकाश फैलाता है। जब द्रव्य और गुण क्षीण हो जाते हैं, तब प्रकाश भी लुप्त हो जाता है ॥15॥
श्लोक 16: इस प्रकार सत्त्वगुण व्यक्त है और पुरुष अव्यक्त माना गया है। हे ब्रह्मर्षियों! इस तत्त्व को समझो। अब मैं तुम्हें आगे की बातें बताता हूँ॥16॥
श्लोक 17: जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, वह हजार बार प्रयत्न करने पर भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता, जबकि बुद्धिमान पुरुष चौथाई प्रयत्न से ही ज्ञान प्राप्त कर लेता है और सुख का अनुभव करता है ॥17॥
श्लोक 18: ऐसा विचार करके मनुष्य को किसी प्रकार धर्म के साधनों का ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए; क्योंकि साधन को जानने वाला चतुर पुरुष महान सुख प्राप्त करता है ॥18॥
श्लोक 19: उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति यात्रा-व्यय की व्यवस्था किए बिना यात्रा करता है, तो उसे मार्ग में बहुत कष्ट उठाना पड़ता है, अथवा बीच रास्ते में ही उसकी मृत्यु भी हो सकती है ॥19॥
श्लोक 20: इसी प्रकार (जो मनुष्य अपने पूर्वजन्मों के पुण्यों से हीन है) जब योगमार्ग में प्रवृत्त होता है, तो उसे योगसिद्धि का फल कठिनाई से प्राप्त होता है, अथवा हो सकता है कि मिलता ही न हो। मनुष्य का अपना कल्याण साधन ही उसे उसके पूर्वजन्म के शुभ-अशुभ संस्कारों का ज्ञान कराता है। 20॥
श्लोक 21: जैसे जब कोई मनुष्य अचानक ही किसी ऐसे लंबे मार्ग पर चलने लगता है, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा (तब वह अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाता), वही दशा सम्यक् ज्ञान से रहित अज्ञानी पुरुष की होती है ॥21॥
श्लोक 22-23h: परंतु जैसे घोड़ों से जुते हुए तेज रथ पर बैठकर उसी मार्ग पर चलने वाला मनुष्य शीघ्र ही अपने गंतव्य पर पहुँच जाता है और ऊँचे पर्वत पर चढ़ने के बाद पृथ्वी की ओर नहीं देखता, वैसे ही बुद्धिमान पुरुष उन्नति करते हैं ॥22 1/2॥
श्लोक 23-24: देखो, रथ से यात्रा करने वाला मूर्ख मनुष्य भी ऊँचे पर्वत पर पहुँचकर कष्ट पाता है, परन्तु बुद्धिमान मनुष्य रथ से उतनी ही दूर तक यात्रा करता है, जितनी दूर तक रथ जा सकता है और जब रथ का मार्ग समाप्त हो जाता है, तब उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता है ॥23-24॥
श्लोक 25: इसी प्रकार बुद्धिमान और गुणवान व्यक्ति, जो योग के सिद्धांतों और विधियों को जानता है, उन्हें अच्छी तरह समझकर आगे बढ़ता है ॥25॥
श्लोक 26: जैसे मनुष्य मोहवश बिना नाव के भयंकर समुद्र में प्रवेश करता है और यह मानता है कि मैं अपनी दोनों भुजाओं से तैरकर उसे पार कर लूँगा, वह निश्चय ही मृत्यु को बुलाता है (उसी प्रकार ज्ञानरूपी नाव का आश्रय लिए बिना मनुष्य इस भवसागर को पार नहीं कर सकता)।॥26॥
श्लोक 27-28: जैसे बुद्धिमान् पुरुष जलमार्गों के विभाग जानकर सुन्दर पतवारों वाली नाव द्वारा जल पर यात्रा करके समुद्र को सहज ही पार कर लेता है और दूसरे किनारे पहुँचकर नाव की आसक्ति त्यागकर आगे बढ़ जाता है; (उसी प्रकार संसार सागर को पार करके बुद्धिमान् पुरुष पहले के साधनों और पदार्थों की आसक्ति त्याग देता है।) रथ पर चलने वाले और पैदल चलने वाले पुरुष के उदाहरण द्वारा यह बात पहले ही कही जा चुकी है॥27-28॥
श्लोक 29: परन्तु प्रेम में आसक्त हुआ मनुष्य स्नेह से बंधा रहता है और उसी नाव में घूमता रहता है, जैसे नाविक सदैव नाव पर बैठा रहता है। 29.
श्लोक 30-31: जैसे नाव पर चढ़कर स्थल पर यात्रा करना संभव नहीं है और रथ पर चढ़कर जल में यात्रा करना संभव नहीं है, वैसे ही मनुष्य के द्वारा किए गए विभिन्न कर्म उसे भिन्न-भिन्न स्थानों पर ले जाते हैं। इस संसार में जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है॥30-31॥
श्लोक 32: जो गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द से संबंधित नहीं है तथा जिसका ऋषिगण बुद्धि से चिंतन करते हैं, उसे 'प्रधान' कहते हैं।
श्लोक 33: प्रधान का दूसरा नाम अव्यक्त है। अव्यक्त का कार्य महत्तत्त्व है और प्रकृति से उत्पन्न महत्तत्त्व का कार्य अहंकार है ॥33॥
श्लोक 34: पाँच महाभूतों को प्रकट करने वाले गुण अहंकार से उत्पन्न हुए हैं। पाँच महाभूतों के कार्य रूप, स्वाद आदि विषय हैं। वे भिन्न-भिन्न गुणों के नाम से प्रसिद्ध हैं। 34॥
श्लोक 35: अव्यक्त प्रकृति कारण और कार्य दोनों है। इसी प्रकार महातत्त्व के कारण और कार्य दोनों सुने गए हैं ॥35॥
श्लोक 36: अहंकार केवल कारण रूप ही नहीं है, वह बार-बार कार्य रूप में भी परिणत होता रहता है। पंचमहाभूतों (पंचतन्मात्राओं) में भी कारण और कारणत्व दोनों होते हैं। वे शब्द आदि वस्तुओं को उत्पन्न करते हैं, इसलिए उन्हें बीजरूप कहा गया है। 36॥
श्लोक 37: उन पाँचों तत्त्वों के विशेष कार्य शब्द आदि विषय हैं। उन विषयों का जनक मन है। 37।
श्लोक 38: पाँच तत्त्वों में से आकाश को एक ही गुण माना गया है। वायु को दो गुणों वाला कहा गया है। अग्नि को तीन गुणों वाला कहा गया है। जल को चार गुणों वाला कहा गया है॥ 38॥
श्लोक 39: पृथ्वी के पाँच गुणों को समझना चाहिए। यह देवी स्थावर-जंगम प्राणियों से परिपूर्ण हैं, समस्त प्राणियों को जन्म देती हैं तथा शुभ-अशुभ का निर्देशन करती हैं ॥39॥
श्लोक 40: विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवीं गंध - ये पृथ्वी के पाँच गुण हैं जिन्हें जानना चाहिए ॥40॥
श्लोक 41: इनमें गंध उसका विशेष गुण है । गंध अनेक प्रकार की मानी गई है । मैं उस गंध के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा ॥41॥
श्लोक 42-43h: पृथ्वी पर दस प्रकार की गंधों को समझना चाहिए - अच्छी (सुगंध), बुरी (दुर्गंध), मधुर, खट्टी, कड़वी, दुर्गन्धहीन (दूर तक पहुँचने वाली), मिश्रित, कसैली, रूखी और ज्वलंत। 42 1/2॥
श्लोक 43-44h: शब्द, स्पर्श, रूप और स्वाद - ये जल के चार गुण माने गए हैं (इनमें स्वाद जल का प्रधान गुण है)। अब मैं स्वाद के विज्ञान का वर्णन करूँगा। स्वाद के अनेक प्रकार बताए गए हैं ॥43 1/2॥
श्लोक 44-45h: जलरूपी रस छह प्रकार का बताया गया है - मधुर, खट्टा, कड़वा, तीखा, कसैला और नमकीन ॥44 1/2॥
श्लोक 45-46h: शब्द, स्पर्श और रूप—ये तेजस के तीन गुण कहे गए हैं। इनमें से रूप तेजस का प्रधान गुण है। रूप के भी अनेक प्रकार माने गए हैं ॥45 1/2॥
श्लोक 46-48h: श्वेत, काला, लाल, नीला, पीला, लाल, छोटा, बड़ा, मोटा, पतला, चौकोर और गोल - ये तेजस रूप के बारह प्रकार के विस्तार हैं, जिन्हें वृद्ध ब्राह्मण, जो सत्यवादी और धर्म को जानने वाले हैं, जानने योग्य कहते हैं।
श्लोक 48-49h: शब्द और स्पर्श—ये वायु के जानने योग्य दो गुण हैं। इनमें स्पर्श वायु का प्रधान गुण है। स्पर्श भी अनेक प्रकार का माना गया है ॥48 1/2॥
श्लोक 49-51: रूखा, ठंडा, गरम, मीठा, चमकीला, कठोर, चिकना, शल्कण (हल्का), पतला, कठोर और कोमल - इन बारह प्रकार के स्पर्शों द्वारा वायु के गुणों का विस्तार तत्त्वज्ञ, धार्मिक और सिद्ध ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक बताया है ॥49-51॥
श्लोक 52h: आकाश शब्द को एक ही गुण माना गया है। उस शब्द के अनेक गुण हैं। मैं उनका विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा। 51 1/2।
श्लोक 52-54h: षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, निषद, धैवत, इष्ट (प्रिय), अनिष्ट (अप्रिय) और संहत (श्लिष्ट) - इस प्रकार दस प्रकार के आकाशजन्य शब्दों का विभाजन किया गया है।
श्लोक 54-55: सम्पूर्ण भूतों में आकाश श्रेष्ठ है। उससे अहंकार श्रेष्ठ है, अहंकार से बुद्धि श्रेष्ठ है, उस बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ है, उससे अव्यक्त प्रकृति श्रेष्ठ है और प्रकृति से भी पुरुष श्रेष्ठ है ॥54-55॥
श्लोक 56: जो पुरुष सम्पूर्ण प्राणियों की श्रेष्ठता और निकृष्टता को जानता है, सम्पूर्ण कर्मों की विधि को जानता है और सम्पूर्ण प्राणियों को आत्म-चेतना से देखता है, वह अविनाशी परमात्मा को प्राप्त होता है ॥56॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥