श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 5: इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  14.5.2 
क्व च तत् साम्प्रतं द्रव्यं भगवन्नवतिष्ठते।
कथं च शक्यमस्माभिस्तदवाप्तुं तपोधन॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे तपस्वी! इस समय वह धन कहाँ है? और हम उसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं?॥2॥
 
O Lord! O ascetic! Where is that wealth at this time? And how can we obtain it?॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)