श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 48: आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  14.48.6 
अनुमानाद् विजानीम: पुरुषं सत्त्वसंश्रयम्।
न शक्यमन्यथा गन्तुं पुरुषं द्विजसत्तमा:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
द्विजवरो! इस अनुमान-प्रमाण से हम भली-भाँति जानते हैं कि अन्तर्यामी ईश्वर आत्मा में सत्व रूप में स्थित है। इस तत्त्व को समझे बिना परब्रह्म की प्राप्ति संभव नहीं है। 6॥
 
Dwijavro! Through this inference-proof, we know very well that the inner God is situated in the soul in the form of Satva. Without understanding this principle it is not possible to attain the Supreme Being. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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